सामान्य वर्ग के लोगों को 10% आरक्षण देने संबंधी बिल लोकसभा में पारित
सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए लाया गया संविधान (124वां संशोधन) विधेयक लोकसभा में पारित हो गया है.
लगभग पाँच घंटे की चर्चा के बाद मंगलवार रात को विधेयक पर मतदान हुआ. समर्थन में 323 मत पड़े जबकि विरोध में केवल 3 मत डाले गए.
विधेयक पास होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट करके इसे ऐतिहासिक बताया. उन्होंने लिखा, "संविधान (124वां संशोधन) विधेयक, 2019 लोकसभा में पास होना हमारे देश के इतिहास में एक ऐतिहासिक क्षण है. यह समाज के सभी तबकों को न्याय दिलाने के लिए एक प्रभावी उपाय को प्राप्त करने में मदद करेगा."
प्रधानमंत्री मोदी ने कुल तीन ट्वीट किए, इसके बाद किए गए ट्वीट में उन्होंने सभी सांसदों का शुक्रिया अदा किया. वहीं तीसरे ट्वीट में लिखा कि उनकी सरकार 'सबका साथ, सबका विकास' के सिद्धांत को लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध है.
उन्होंने लिखा कि उनका प्रयास है कि किसी भी जाति, पंथ के ग़रीब व्यक्ति को गरिमा से जीवन जीने और संभावित अवसरों का मौक़ा मिले.
केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं सहकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने लोकसभा में इससे संबंधित बिल पेश किया था.
इस बिल पर हुई चर्चा में बुधवार को लोकसभा में क्या-क्या हुआ पढ़िए-
केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत ने चर्चा की शुरुआत करते हुए बिल का ब्यौरा दिया.
उनके भाषण की मुख्य बातें:
इसके पूर्व 21 बार प्राइवेट मेंबर बिल लाकर अनारक्षित वर्ग के लिए आरक्षण संबंधी सुविधाएँ प्रदान करने की माँग हुईं.
मंडल आयोग ने भी इसकी अनुशंसा की थी.
नरसिंह राव सरकार ने 1992 में एक प्रावधान किया था पर संविधान संशोधन नहीं होने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया.
सिन्नो कमीशन (कमीशन टू एग्ज़ामिन सब-कैटेगोराइजेशन ऑफ ओबीसी) ने 2004 से 2010 तक इस बारे में काम किया और 2010 में तत्कालीन सरकार को प्रतिवेदन दिया.
मोदी सरकार ने इसी कमिशन की सिफ़ारिश के आधार पर संविधान संशोधन बिल तैयार किया है.
प्रस्तावित आरक्षण का कोटा वर्तमान कोटे से अलग होगा. अभी देश में कुल 49.5 फ़ीसदी आरक्षण है. अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 फ़ीसदी, अनुसूचित जातियों को 15 फ़ीसदी और अनुसूचित जनजाति को 7.5 फ़ीसदी आरक्षण की व्यवस्था है.
संविधान के आर्टिकल 15 में 15.6 जोड़ा गया है जिसके अनुसार राज्य और भारत सरकार को इस संबंध में कानून बनाने से नहीं रोका जा सकेगा.
इसके अनुसार आर्थिक रूप से दुर्बल सामान्य वर्ग को शैक्षणिक संस्थानों में 10 फ़ीसदी आरक्षण का प्रस्ताव किया गया है.
संविधान के 16 आर्टिकल में एक बिंदु जोड़ा जाएगा जिसके अनुसार राज्य सरकार और केंद्र सरकार 10 फ़ीसदी आरक्षण दे सकते हैं.
ग़रीब सवर्णों को प्रस्तावित 10 फ़ीसदी आरक्षण मौजूदा 50 फ़ीसदी की सीमा से अलग होगा.
ये जल्दबाज़ी में लिया गया फ़ैसला है. सरकार ने वादा किया था कि वो देश के युवाओं को नौकरियां देगी. लेकिन पांच साल का कार्यकाल ख़त्म होने आया है और अब तक कुछ नहीं किया गया है.
जब नौकरी के नए आयाम बनाए ही नहीं गए हैं तो ये बिल लाने का मतलब क्या है.
इस बिल के अनुसार आय की सीमा आठ लाख दी गई है, जिसका मतलब 63 हज़ार प्रति माह है जो किसी मायने में कम नहीं है और रही ज़मीन की बात तो वो तो कइयों के पास है ही नहीं.
कई सरकारें आई और प्रयास हुए लेकिन सही तरीक़े से प्रयास नहीं हुआ था इस कारण क़ानूनी तौर पर ये प्रयास रुक गए.
अगर हम राजनीतिक मतभेद अलग कर लें तो हमें आरक्षण के मामले को समझने में मदद होगी.
समाज में ऐतिहासिक तौर पर फ़र्क था और संविधान निर्माताओं ने हर आधार पर बराबरी के लिए कोशिशें की.
आर्थिक आधार पर 10 फ़ीसदी आरक्षण के लिए पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने नोटिफ़िकेशन का रास्ता अपनाया. लेकिन कोर्ट ने अधिकतम 50 फ़ीसद तक आरक्षण की बात की है इस कारण ये रद्द हुआ.
मीडिया के भी कई हलकों में इस बात का ज़िक्र किया गया और कहा गया कि ये बिल भी रद्द हो जाएगा. लेकिन ये सभी नोटिफ़िकेशन संविधान के आधार पर नहीं था क्योंकि आरक्षण की कल्पना जाति के आधार पर की गई थी. मुझे यकीन है कि सुप्रीम कोर्ट ने जो 50 फ़ीसदी की सीमा लगाई वो संविधान का धारा 16.4 के आधार पर दिए जाने वाले आरक्षण यानी जाति के आधार (एससी, एसटी और ओबीसी) पर आरक्षण पर था.
कांग्रेस के घोषणा-पत्र में भी कहा गया था कि पार्टी मौजूदा आरक्षण से आगे बढ़कर आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लोगों को आरक्षण देने की कोशिशें करेंगी. हमने भी यही बात कही थी. समर्थन करना है तो पूरे मन के साथ कीजिए.
लगभग पाँच घंटे की चर्चा के बाद मंगलवार रात को विधेयक पर मतदान हुआ. समर्थन में 323 मत पड़े जबकि विरोध में केवल 3 मत डाले गए.
विधेयक पास होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट करके इसे ऐतिहासिक बताया. उन्होंने लिखा, "संविधान (124वां संशोधन) विधेयक, 2019 लोकसभा में पास होना हमारे देश के इतिहास में एक ऐतिहासिक क्षण है. यह समाज के सभी तबकों को न्याय दिलाने के लिए एक प्रभावी उपाय को प्राप्त करने में मदद करेगा."
प्रधानमंत्री मोदी ने कुल तीन ट्वीट किए, इसके बाद किए गए ट्वीट में उन्होंने सभी सांसदों का शुक्रिया अदा किया. वहीं तीसरे ट्वीट में लिखा कि उनकी सरकार 'सबका साथ, सबका विकास' के सिद्धांत को लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध है.
उन्होंने लिखा कि उनका प्रयास है कि किसी भी जाति, पंथ के ग़रीब व्यक्ति को गरिमा से जीवन जीने और संभावित अवसरों का मौक़ा मिले.
केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं सहकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने लोकसभा में इससे संबंधित बिल पेश किया था.
इस बिल पर हुई चर्चा में बुधवार को लोकसभा में क्या-क्या हुआ पढ़िए-
केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत ने चर्चा की शुरुआत करते हुए बिल का ब्यौरा दिया.
उनके भाषण की मुख्य बातें:
इसके पूर्व 21 बार प्राइवेट मेंबर बिल लाकर अनारक्षित वर्ग के लिए आरक्षण संबंधी सुविधाएँ प्रदान करने की माँग हुईं.
मंडल आयोग ने भी इसकी अनुशंसा की थी.
नरसिंह राव सरकार ने 1992 में एक प्रावधान किया था पर संविधान संशोधन नहीं होने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया.
सिन्नो कमीशन (कमीशन टू एग्ज़ामिन सब-कैटेगोराइजेशन ऑफ ओबीसी) ने 2004 से 2010 तक इस बारे में काम किया और 2010 में तत्कालीन सरकार को प्रतिवेदन दिया.
मोदी सरकार ने इसी कमिशन की सिफ़ारिश के आधार पर संविधान संशोधन बिल तैयार किया है.
प्रस्तावित आरक्षण का कोटा वर्तमान कोटे से अलग होगा. अभी देश में कुल 49.5 फ़ीसदी आरक्षण है. अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 फ़ीसदी, अनुसूचित जातियों को 15 फ़ीसदी और अनुसूचित जनजाति को 7.5 फ़ीसदी आरक्षण की व्यवस्था है.
संविधान के आर्टिकल 15 में 15.6 जोड़ा गया है जिसके अनुसार राज्य और भारत सरकार को इस संबंध में कानून बनाने से नहीं रोका जा सकेगा.
इसके अनुसार आर्थिक रूप से दुर्बल सामान्य वर्ग को शैक्षणिक संस्थानों में 10 फ़ीसदी आरक्षण का प्रस्ताव किया गया है.
संविधान के 16 आर्टिकल में एक बिंदु जोड़ा जाएगा जिसके अनुसार राज्य सरकार और केंद्र सरकार 10 फ़ीसदी आरक्षण दे सकते हैं.
ग़रीब सवर्णों को प्रस्तावित 10 फ़ीसदी आरक्षण मौजूदा 50 फ़ीसदी की सीमा से अलग होगा.
ये जल्दबाज़ी में लिया गया फ़ैसला है. सरकार ने वादा किया था कि वो देश के युवाओं को नौकरियां देगी. लेकिन पांच साल का कार्यकाल ख़त्म होने आया है और अब तक कुछ नहीं किया गया है.
जब नौकरी के नए आयाम बनाए ही नहीं गए हैं तो ये बिल लाने का मतलब क्या है.
इस बिल के अनुसार आय की सीमा आठ लाख दी गई है, जिसका मतलब 63 हज़ार प्रति माह है जो किसी मायने में कम नहीं है और रही ज़मीन की बात तो वो तो कइयों के पास है ही नहीं.
कई सरकारें आई और प्रयास हुए लेकिन सही तरीक़े से प्रयास नहीं हुआ था इस कारण क़ानूनी तौर पर ये प्रयास रुक गए.
अगर हम राजनीतिक मतभेद अलग कर लें तो हमें आरक्षण के मामले को समझने में मदद होगी.
समाज में ऐतिहासिक तौर पर फ़र्क था और संविधान निर्माताओं ने हर आधार पर बराबरी के लिए कोशिशें की.
आर्थिक आधार पर 10 फ़ीसदी आरक्षण के लिए पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने नोटिफ़िकेशन का रास्ता अपनाया. लेकिन कोर्ट ने अधिकतम 50 फ़ीसद तक आरक्षण की बात की है इस कारण ये रद्द हुआ.
मीडिया के भी कई हलकों में इस बात का ज़िक्र किया गया और कहा गया कि ये बिल भी रद्द हो जाएगा. लेकिन ये सभी नोटिफ़िकेशन संविधान के आधार पर नहीं था क्योंकि आरक्षण की कल्पना जाति के आधार पर की गई थी. मुझे यकीन है कि सुप्रीम कोर्ट ने जो 50 फ़ीसदी की सीमा लगाई वो संविधान का धारा 16.4 के आधार पर दिए जाने वाले आरक्षण यानी जाति के आधार (एससी, एसटी और ओबीसी) पर आरक्षण पर था.
कांग्रेस के घोषणा-पत्र में भी कहा गया था कि पार्टी मौजूदा आरक्षण से आगे बढ़कर आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लोगों को आरक्षण देने की कोशिशें करेंगी. हमने भी यही बात कही थी. समर्थन करना है तो पूरे मन के साथ कीजिए.
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