ट्रंप-किम की दूसरी मुलाक़ात और चार चुनौतियां
अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के मुताबिक उनके और उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन के बीच दूसरी मुलाक़ात 27 और 28 फरवरी को होगी.
ये मुलाक़ात वियतनाम में होगी और इसमें परमाणु मुद्दे पर बातचीत होगी. इसके पहले ये दोनों नेता जून 2018 में सिंगापुर में मिले थे.
दूसरी मुलाक़ात की तैयारी में जुटे दोनों नेताओं के सामने कई चुनौतियां हैं.
डोनल्ड ट्रंप और किम जोंग उन के बीच जून 2018 में हुई पहली मुलाकात को लेकर बड़ा कौतुहल और चर्चा थी और दोनों ही नेताओं ने इस आडंबरपूर्ण मुलाक़ात को भुनाने का पूरा प्रयास किया.
शायद उस ऐतिहासिक मुलाक़ात के दौरान संबंधों पर जमी बर्फ पिघलने का असर दोनों ओर रहा हो.
लेकिन उस मीटिंग के बाद बातें उम्मीद के मुताबिक आगे नहीं बढ़ीं. उत्तर कोरिया को परमाणु हथियारों को मुक्त करने के अमरीकी लक्ष्य के मुताबिक कोई ठोस नतीजा नहीं दिखा. वहीं, उत्तर कोरिया इस बात को लेकर निराश है कि अमरीका उस पर लगी पाबंदियों में छूट देने को तैयार नहीं है.
इसलिए अब दोनों पक्षों पर इस बात का दबाव है कि वो कुछ ठोस बातें लेकर आएं.
दिक्कत ये है कि दोनों नेताओं ने परमाणु मुद्दे को व्यक्तिगत बना दिया. ट्रंप और किम एक दूसरे से सीधे बात करना पसंद करते हैं. उनके बीच ख़तों और गर्मजोशी भरे शब्दों के आदान-प्रदान हुए हैं.
अमरीका को इस बात की चिंता है कि ये तरीका ट्रंप के मुक़ाबले किम जोंग उन के लिए मुफीद है.
इसका समाधान ये है कि दोनों नेताओं के बीच शिखर सम्मेलन होने के पहले अधिकारियों के स्तर पर चर्चाएं हों.
पिछले मौके पर ये नहीं हुआ था लेकिन इस बार ऐसा किया जा रहा है.
वास्तविक उपलब्धि ये होगी कि शिखर वार्ता के दौरान विशेषज्ञ स्तर पर आगे बढ़ते रहने के लिए एक ढांचे को लेकर सहमति तैयार की जाए.
ट्रंप और किम के बीच सिंगापुर में हुई मुलाक़ात के दौरान दोनों देश 'कोरियाई प्रायद्वीप को पूरी तरह परमाणु हथियारों से मुक्त करने' पर सहमत हुए थे.
लेकिन उनके आशय जो थे, वो बातें कही नहीं गईं. इसे लेकर ही सवाल है कि क्या इस पर कोई समझौता हो सकता है.
अमरीका के लिए परमाणु हथियार ख़त्म करने का मतलब ये है कि उत्तर कोरिया एकतरफा तरीके से अपने सारे परमाणु हथियार हटाए और अंतरराष्ट्रीय जांचकर्ताओं को इसकी पुष्टि करने की अनुमति दे.
उत्तर कोरिया के लिए इसका मतलब ये है कि अमरीका 'इसके जवाब में' इस क्षेत्र से अपने परमाणु हथियारों को हटाए ताकि उस पर ख़तरा न रहे.
इनमें से ज्यादातर बातों पर अमरीका मोल तोल नहीं करना चाहता.
अमरीकी सेना के जनरल बेशक हैरान रह गए हों लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप साफ कर चुके हैं कि वो दक्षिण कोरिया में तैनात सैनिकों को घर वापस लाना चाहते हैं. हालांकि उन्होंने ये भी कहा है कि फिलहाल उनकी ऐसा करने की कोई योजना नहीं है.
ख़ैर, किम जोंग उन ने अब तक परमाणु हथियार हटाने को लेकर लिखित तौर पर वादा नहीं किया है. विशेषज्ञों का कहना है कि उन पर ऐसा करने के लिए दबाव बनाया जाना चाहिए और उस स्थिति को हासिल करने के लिए विस्तार से खाका तैयार कर उस पर भी उनकी सहमति ली जानी चाहिए.
ये एक वास्तविक चुनौती है.
अमरीकी विदेश मंत्रालय में उत्तर कोरिया के लिए प्रतिनिधि स्टीफन बीगन ने बीते हफ़्ते माना था कि परमाणु हथियार मुक्त करने के लक्ष्यों के रास्ते में रुकावटें हैं. उन्होंने ये भी कहा था कि 'आने वाले वक्त' में उत्तर कोरिया के साथ एक समझौता होगा.
दोनों पक्षों की ओर से जो संकेत मिले हैं, उससे ट्रंप और किम की मुलाक़ात के दौरान कुछ कदम उठाए जाने को लेकर उम्मीदें बढ़ गई हैं.
बीगन के मुताबिक उत्तर कोरिया ने प्रस्ताव दिया है कि अगर ट्रंप प्रशासन 'जवाबी उपाय करता है' तो वो परमाणु बम का ईंधन तैयार करने वाले अपने सभी संयंत्रों को नष्ट करने को तैयार है.
किम जोंग उन अमरीका से रियायत के तौर पर प्रतिबंधों में ढील और सुरक्षा की गारंटी चाहते हैं. मसलन कोरियाई युद्ध के ख़त्म होने का औपचारिक एलान किया जाए.
फिलहाल ऐसा लगता है कि अमरीका परमाणु हथियार हटाने के लिए वास्तविक कदम उठाने की अपनी मांग को लेकर रुख नरम कर रहा है. किम जोंग उन एक कदम के बदले एक कदम उठाने के जिस रुख की वकालत कर रहे हैं, अमरीका भी उसी दिशा में आगे बढ़ता दिखता है.
ऐसी भी रिपोर्टें आईं हैं जिनमें कहा गया है कि उत्तर कोरिया के परमाणु और मिसाइल हथियारों के निर्माण पर रोक लगाने की स्थिति में उसे प्रतिबंधों में आंशिक छूट दी जा सकती है. गौरतलब है कि उत्तर कोरिया ने परीक्षणों पर रोक लगा दी है लेकिन अभी उत्पादन बंद नहीं किया है.
इस मामले में चुनौती ये तय करने की होगी कि इसके बाद उत्तर कोरिया अपने पास मौजूद परमाणु हथियार खत्म करने की दिशा में ठोस कदम उठाए.
चिंता ये है कि ट्रंप परमाणु हथियार ख़त्म करने का साफ रास्ता तय करने के बजाए एक अंतरिम समझौता कर सकते हैं.
ये मुलाक़ात वियतनाम में होगी और इसमें परमाणु मुद्दे पर बातचीत होगी. इसके पहले ये दोनों नेता जून 2018 में सिंगापुर में मिले थे.
दूसरी मुलाक़ात की तैयारी में जुटे दोनों नेताओं के सामने कई चुनौतियां हैं.
डोनल्ड ट्रंप और किम जोंग उन के बीच जून 2018 में हुई पहली मुलाकात को लेकर बड़ा कौतुहल और चर्चा थी और दोनों ही नेताओं ने इस आडंबरपूर्ण मुलाक़ात को भुनाने का पूरा प्रयास किया.
शायद उस ऐतिहासिक मुलाक़ात के दौरान संबंधों पर जमी बर्फ पिघलने का असर दोनों ओर रहा हो.
लेकिन उस मीटिंग के बाद बातें उम्मीद के मुताबिक आगे नहीं बढ़ीं. उत्तर कोरिया को परमाणु हथियारों को मुक्त करने के अमरीकी लक्ष्य के मुताबिक कोई ठोस नतीजा नहीं दिखा. वहीं, उत्तर कोरिया इस बात को लेकर निराश है कि अमरीका उस पर लगी पाबंदियों में छूट देने को तैयार नहीं है.
इसलिए अब दोनों पक्षों पर इस बात का दबाव है कि वो कुछ ठोस बातें लेकर आएं.
दिक्कत ये है कि दोनों नेताओं ने परमाणु मुद्दे को व्यक्तिगत बना दिया. ट्रंप और किम एक दूसरे से सीधे बात करना पसंद करते हैं. उनके बीच ख़तों और गर्मजोशी भरे शब्दों के आदान-प्रदान हुए हैं.
अमरीका को इस बात की चिंता है कि ये तरीका ट्रंप के मुक़ाबले किम जोंग उन के लिए मुफीद है.
इसका समाधान ये है कि दोनों नेताओं के बीच शिखर सम्मेलन होने के पहले अधिकारियों के स्तर पर चर्चाएं हों.
पिछले मौके पर ये नहीं हुआ था लेकिन इस बार ऐसा किया जा रहा है.
वास्तविक उपलब्धि ये होगी कि शिखर वार्ता के दौरान विशेषज्ञ स्तर पर आगे बढ़ते रहने के लिए एक ढांचे को लेकर सहमति तैयार की जाए.
ट्रंप और किम के बीच सिंगापुर में हुई मुलाक़ात के दौरान दोनों देश 'कोरियाई प्रायद्वीप को पूरी तरह परमाणु हथियारों से मुक्त करने' पर सहमत हुए थे.
लेकिन उनके आशय जो थे, वो बातें कही नहीं गईं. इसे लेकर ही सवाल है कि क्या इस पर कोई समझौता हो सकता है.
अमरीका के लिए परमाणु हथियार ख़त्म करने का मतलब ये है कि उत्तर कोरिया एकतरफा तरीके से अपने सारे परमाणु हथियार हटाए और अंतरराष्ट्रीय जांचकर्ताओं को इसकी पुष्टि करने की अनुमति दे.
उत्तर कोरिया के लिए इसका मतलब ये है कि अमरीका 'इसके जवाब में' इस क्षेत्र से अपने परमाणु हथियारों को हटाए ताकि उस पर ख़तरा न रहे.
इनमें से ज्यादातर बातों पर अमरीका मोल तोल नहीं करना चाहता.
अमरीकी सेना के जनरल बेशक हैरान रह गए हों लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप साफ कर चुके हैं कि वो दक्षिण कोरिया में तैनात सैनिकों को घर वापस लाना चाहते हैं. हालांकि उन्होंने ये भी कहा है कि फिलहाल उनकी ऐसा करने की कोई योजना नहीं है.
ख़ैर, किम जोंग उन ने अब तक परमाणु हथियार हटाने को लेकर लिखित तौर पर वादा नहीं किया है. विशेषज्ञों का कहना है कि उन पर ऐसा करने के लिए दबाव बनाया जाना चाहिए और उस स्थिति को हासिल करने के लिए विस्तार से खाका तैयार कर उस पर भी उनकी सहमति ली जानी चाहिए.
ये एक वास्तविक चुनौती है.
अमरीकी विदेश मंत्रालय में उत्तर कोरिया के लिए प्रतिनिधि स्टीफन बीगन ने बीते हफ़्ते माना था कि परमाणु हथियार मुक्त करने के लक्ष्यों के रास्ते में रुकावटें हैं. उन्होंने ये भी कहा था कि 'आने वाले वक्त' में उत्तर कोरिया के साथ एक समझौता होगा.
दोनों पक्षों की ओर से जो संकेत मिले हैं, उससे ट्रंप और किम की मुलाक़ात के दौरान कुछ कदम उठाए जाने को लेकर उम्मीदें बढ़ गई हैं.
बीगन के मुताबिक उत्तर कोरिया ने प्रस्ताव दिया है कि अगर ट्रंप प्रशासन 'जवाबी उपाय करता है' तो वो परमाणु बम का ईंधन तैयार करने वाले अपने सभी संयंत्रों को नष्ट करने को तैयार है.
किम जोंग उन अमरीका से रियायत के तौर पर प्रतिबंधों में ढील और सुरक्षा की गारंटी चाहते हैं. मसलन कोरियाई युद्ध के ख़त्म होने का औपचारिक एलान किया जाए.
फिलहाल ऐसा लगता है कि अमरीका परमाणु हथियार हटाने के लिए वास्तविक कदम उठाने की अपनी मांग को लेकर रुख नरम कर रहा है. किम जोंग उन एक कदम के बदले एक कदम उठाने के जिस रुख की वकालत कर रहे हैं, अमरीका भी उसी दिशा में आगे बढ़ता दिखता है.
ऐसी भी रिपोर्टें आईं हैं जिनमें कहा गया है कि उत्तर कोरिया के परमाणु और मिसाइल हथियारों के निर्माण पर रोक लगाने की स्थिति में उसे प्रतिबंधों में आंशिक छूट दी जा सकती है. गौरतलब है कि उत्तर कोरिया ने परीक्षणों पर रोक लगा दी है लेकिन अभी उत्पादन बंद नहीं किया है.
इस मामले में चुनौती ये तय करने की होगी कि इसके बाद उत्तर कोरिया अपने पास मौजूद परमाणु हथियार खत्म करने की दिशा में ठोस कदम उठाए.
चिंता ये है कि ट्रंप परमाणु हथियार ख़त्म करने का साफ रास्ता तय करने के बजाए एक अंतरिम समझौता कर सकते हैं.
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