बिहार: जानिए किस उम्मीदवार के लिए राजद ने छोड़ दी अपनी सीट

अस्सी के दशक में भाकपा-माले बिहार के भोजपुर सहित भारत के कई हिस्सों में ग़रीब और वंचित किसानों के हक़ के लिए संघर्ष कर रही थी.

इसकी अगुवाई कर रहे थे पार्टी महासचिव कॉमरेड विनोद मिश्र. भूमिगत आन्दोलन के दौर में उनका एक छद्म नाम राजू भी था. इसी दौर में भोजपुर के गोरपा गाँव में भारतीय सेना के पूर्व जवान और भाकपा-माले कार्यकर्ता आरटी सिंह के यहाँ एक बच्चे का जन्म हुआ.

उस बच्चे का नाम उन्होंने अपने प्रिय नेता के नाम पर राजू रखा. आज वही राजू यानी राजू यादव आरा सीट से भाकपा-माले के उम्मीदवार हैं. वे लगातार दूसरी बार यहाँ से चुनाव मैदान में हैं.

आरा की सीट इस मायने में अभी चर्चा में है कि राजद की अगुवाई वाले महागठबंधन ने वाम दलों के लिए बिहार में जो एक मात्र सीट छोड़ी है वो है आरा लोकसभा की सीट.

राजद ने अपने बीस सीटों के कोटे में से भाकपा-माले को यह सीट दी है. ग़ौरतलब है कि बिहार में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी अपने चर्चित युवा नेता कन्हैया कुमार के लिए राजद से बेगूसराय सीट की मांग कर रही थी लेकिन राजद इसके लिए तैयार नहीं हुई.

राजद का मानना है कि उसने आरा सीट भाकपा-माले के लिए छोड़कर इलाक़े के लंबे जनसंघर्ष का सम्मान किया है. जैसा कि पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और सांसद मनोज झा कहते हैं, "आरा की धरती क्रांति और सबाल्टर्न चेतना के लिहाज़ से बहुत अहम स्थान रखती है. वहां ऐसे संघर्ष हुए जिससे खेतिहर मज़दूरों और समाज का संकट प्रमुखता से सामने आया. इसके मद्देनज़र हमारे नेता की समझ बनी की यह सीट भाकपा-माले के लिए छोड़ी जाए."

'मीसा भारती के लिए नहीं हुई है कोई डील'
हालांकि राजद के इस 'सम्मान' प्रदर्शन से भाकपा-माले पूरी तरह ख़ुश नहीं है. पार्टी ने वामपंथियों को महागठबंधन से बाहर रखने के फ़ैसले को भाजपा विरोधी मतों के ध्रुवीकरण की संभावना को कमज़ोर करने वाला फ़ैसला बताया है. बावजूद इसके भाकपा-माले ने आरा सीट के बदले में आरा की बग़लवाली सीट पाटलिपुत्र पर राजद का समर्थन करने का फ़ैसला किया है. भाकपा-माले ने जहानाबाद, काराकाट और सिवान में अपने उमीदवार भी उतारे हैं.

पाटलिपुत्र सीट से लालू यादव की सबसे बड़ी बेटी और राज्यसभा सांसद डॉक्टर मीसा भारती राजद की उम्मीदवार हैं. 2014 में वह क़रीब चालीस हज़ार मतों से भाजपा उम्मीदवार रामकृपाल यादव से हारी थीं और यहाँ भाकपा-माले के उम्मीदवार रामेश्वर प्रसाद को क़रीब पचास हज़ार वोट मिले थे.

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ऐसे में क्या राजद ने लालू परिवार के उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित करने के लिए आरा सीट पर वामपंथ का समर्थन किया है और वामपंथ के संघर्ष के दूसरे अहम इलाक़े बेगूसराय पर वामपंथ का समर्थन करने से अपनी सुविधा के हिसाब से पीछे हट गई है?

इस सवाल के जवाब में मनोज झा कहते हैं, "राजद और भाकपा-माले दोनों के चरित्र में डील की राजनीति नहीं है. साथ ही यह भी समझने की ज़रुरत है कि आरा और बेगूसराय का संघर्ष अलग-अलग तरह का है."

"जहां तक बेगूसराय की सीट छोड़ने की बात है तो 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन और स्थानीय इकाई की मांग को देखते हुए राजद के लिए यह सीट छोड़ना मुमकिन नहीं था."

पिछले लोकसभा चुनाव में राजद के तनवीर हसन बेगूसराय सीट पर भाजपा के भोला सिंह से क़रीब साठ हज़ार मतों से पिछड़ गए थे. यहां से तनवीर हसन एक बार फिर से राजद के उम्मीदवार बनाए गए हैं तो वहीं भोला सिंह की मौत के बाद इस बार भाजपा ने केंद्रीय मंत्री और विवादास्पद बयान देते रहने वाले नेता गिरिराज सिंह को मैदान में उतरा है. चर्चित युवा नेता कन्हैया कुमार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार हैं.

अब एक बार फिर से बात आरा से भाकपा-माले उम्मीदवार राजू यादव की. उन्हें राजनीति विरासत में मिली. वे छात्र जीवन से ही राजनीति में सक्रिय हो गए थे.

अभी मात्र सैंतीस साल की उम्र में वे अपनी पार्टी के सेंट्रल कमेटी मेंबर और साथ ही किसान महासभा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य भी हैं. राजू भोजपुर की जनता को ही अपनी सबसे बड़ी ताक़त बताते हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "मैंने हाल के वर्षों में छात्रों, किसानों, नौजवानों से लेकर जनता के हर वर्ग के लिए जो संघर्ष किया है उस कारण से सभी न्यायपसंद लोगों का हमें व्यापक समर्थन मिल रहा है. लोगों के बीच में रहना, उनकी समस्याओं को हल करना और उनकी सेवा करना ही मेरी ताक़त है."

आरा शहर के स्थानीय पत्रकार प्रशांत कुमार बंटी भी राजू यादव को एक संघर्ष करने वाला नेता बताते हैं. प्रशांत कहते हैं, "राजू एक सौम्य छवि वाले लड़ाकू नेता हैं. पार्टी दायरे के बाहर भी लोग इन्हें पसंद करते हैं. भोजपुर में हाल के दिनों में छात्रों, युवाओं और किसानों के जितने भी आन्दोलन हुए है उनमें राजू यादव की अहम भूमिका रही है."

राजू यादव का मानना है कि उनको मिला राजद का समर्थन वोटों में भी तब्दील होगा क्योंकि उनकी पार्टी और राजद का सामाजिक आधार एक है.

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लेकिन प्रभात ख़बर के स्थानीय संपादक अजय कुमार का मानना है कि राजद का वोट हासिल करना ही राजू यादव के लिए सबसे बड़ी चुनौती है.

वह कहते हैं, "भाकपा-माले और राजद के बीच समझौता भले ही है, लेकिन स्थानीय हालात वोट के झुकाव को प्रभावित करते हैं. आरा के सांसद और केंद्रीय मंत्री आरके सिंह की छवि सभी जाति और बिरादरी में काम करने वाले नेता की बनी है."

"ऐसे में राजद के आधार का एक अच्छा-ख़ासा हिस्सा आरके सिंह के समर्थन में भी जा सकता है और इसकी काट खोजना भी राजू यादव के लिए एक बड़ी चुनौती होगी."

अजय कुमार के मुताबिक़ इस बार आरा में आमने-सामने की लड़ाई है और ऐसे हालात में ध्रुवीकरण बड़ी तेज़ी से होने के कारण आरा में इस बार मुक़ाबला बहुत दिलचस्प होने जा रहा है.

1989 में आरा सीट पर इंडियन पीपल्स फ्रंट यानी की आईपीएफ़ के रामेश्वर प्रसाद ने जीत दर्ज की थी. यह एक तरह से भाकपा-माले की ही जीत थी क्योंकि तब पार्टी भूमिगत थी और उसके उम्मीदवारों ने आईपीएफ़ के बैनर तले चुनाव लड़ा था जो कि उसका खुला मोर्चा था.

इसके बाद भाकपा-माले दोबारा कभी यह सीट जीत तो नहीं पाई मगर वह हर चुनाव में पूरी मज़बूती से मुक़ाबले में बनी रही. ऐसे में राजद के समर्थन के बाद भाकपा-माले के लिए इस सीट जीत दर्ज करना उसकी प्रतिष्ठा से जुड़ गया है.

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