तीन तलाक़ क़ानून पर सुनवाई को तैयार सुप्रीम कोर्ट

तीन तलाक़ को दंडात्मक अपराध बनाने वाले क़ानून को चुनौती देने वाली तीन याचिकाओं की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पर सहमति दे दी है. साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने इस संबंध में केंद्र सरकार को नोटिस भी जारी किया है.

याचिका में मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) एक्ट की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है जिसे पिछले महीने ही संसद में पास किया गया था.

सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाहियों पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुचित्र मोहंती ने बताया कि जस्टिस एनवी रमन्ना ने भारत सरकार को नोटिस भेजा है.

याचिकाकर्ताओं में से एक जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने कहा है कि इस क़ानून के तहत तीन तलाक़ को ग़ैर ज़मानती अपराध बनाया गया ताकि मुस्लिम पुरुषों को तीन साल के लिए जेल में बंद किया जा सके जबकि इसी भारत में पत्नी को छोड़ देना अपराध नहीं माना जाता है.

संगठन का कहना था कि इस क़ानून के तहत तीन साल की सज़ा का प्रावधान 'असंगत और ज़्यादती' है.

पिछले महीने राज्यसभा में विपक्ष के भारी विरोध के बावजूद तीन तलाक़ पर विधेयक पास हो गया था.

मोदी सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में तीन तलाक़ को ग़ैर-क़ानूनी घोषित करने के लिए क़ानून बनाने की कोशिश की.

मगर ये मामला अदालत में गया और विभिन्न पक्षों की बातें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 22 अगस्त 2017 को तीन तलाक़ को अवैध घोषित कर दिया और केंद्र को क़ानून बनाने का आदेश दिया.

इसके बाद सरकार तीन तलाक़ पर विधेयक लेकर आई जो दिसंबर 2017 में लोक सभा से पास हो गया.

मगर अगले साल राज्य सभा से ये विधेयक पास नहीं हो पाया जिसके बाद सितंबर 2018 में सरकार ने अध्यादेश लाकर तीन तलाक़ को अवैध घोषित कर दिया.

इसका विरोध हुआ मगर प्रचंड बहुमत के साथ दोबारा सत्ता में आई मोदी सरकार ने 25 जुलाई 2019 को विधेयक को लोक सभा से पारित करवाया और पाँच दिन बाद 30 जुलाई को सरकार ये बिल राज्य सभा से भी पारित करवाने में सफल रही.

हालाँकि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके और राष्ट्रीय जनता दल ने इस बिल को 'पक्षपाती, असंवैधानिक और एकतरफ़ा' क़रार देते हुए आरोप लगाया कि 'मोदी सरकार ने इसे संख्याबल के जुगाड़ से पारित कराया है.'

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